Wednesday, April 29, 2009

ओ कान्हा...






ओ कान्हा! अब तोह मुरली की, मधुर सुना दो तान-...
मैं हु तेरी प्रेम दीवानी, मुझको तू पहचान.....मधुर सुना दो तान...
ओ कान्हा.......

जबसे तुम संग मैंने अपने नैना जोड़ लिए है,
क्या मैया क्या बाबुल, सबसे रिश्ते तोड़ लिए है.....
तेरे मिलन को व्याकुल है ये, कबसे मेरे प्राण....मधुर सुना दो तान.....


सागर से भी गहरी मेरे प्रेम की गहराई, लोक, लाज , कुल की मर्यादा त्यज कर मैं तोह आई.....
मेरी प्रीती से निर्मोही, अब ना बनो अनजान....

मधुर सुना दो तान-


3 comments:

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' said...

ओ कान्हा! अब तोह मुरली की, मधुर सुना दो तान-...
मैं हु तेरी प्रेम दीवानी, मुझको तू पहचान.....मधुर सुना दो तान...
ओ कान्हा.......
आप का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।
हर सप्ताह रविवार को तीनों ब्लागों पर नई रचनाएं डाल रहा हूँ। हरेक पर आप के टिप्प्णी का इन्तज़ार है.....
for ghazal ----- www.pbchaturvedi.blogspot.com
for geet ---www.prasannavadanchaturvedi.blogspot.com
for Romantic ghazal -- www.ghazalgeet.blogspot.com
मुझे यकीन है आप के आने का...और यदि एक बार आप का आगमन हुआ फ़िर..आप तीनों ब्लागों पर बार -बार आयेंगे..........मुझे यकीन है....

shyam gupta said...

पलक जी, बहुत सुन्दर रचना, बधाई।
----कन्हा की लीला देख्ने के लिये मेरे ब्लोग--साहित्यश्याम -पर क्लिक करें।

Raj said...

aaj "janmasthami" ke avsaar pe yeh suna....maan mein ekdum pavan sa ehsaash huwa!!!